11 September 2015

जिक्र आपका अंजुमनमें शायरीकी तरह बारबार हुए है ,मुकुल दवे "चातक"


जिक्र आपका  अंजुमनमें  शायरीकी  तरह बारबार हुए है ,
इश कदर  तुम्हारे  इश्कमें  तसव्वुरके  अशआर   हुए   है ,

गुलोंकी    वादियोमे    आरजू    भरे    कांटोके   साये    है ,
उन्ही    सायेके    तले    तुमसे    फुलोंके    वार   हुए    है ,

मेरे   हाथोंकी   लकीरेमें   तेरा   नाम   चमकता   सुनासा ,
खुदाभी  बेरहम  नहीं  जुग्नू  भी  अँधेरेमें  निसार  हुए  है ,

तुझसे  बिछड़े  जैसे  चलता  है  साथ  तेरे शहेरका रास्ता ,
रंजिशें सही गुजरे तेरे कुचेसे यादका मंझर निखार हुए है ,

मेरी   बे-जूंबा   महोब्बतसे   भले   ही   हो आप   ग़ाफ़िल ,
होंटोंकी  आपकी गहरी मुस्कानमें प्यारका इकरार हुए है ,

मुकुल दवे "चातक"
अंजुमन-મહેફિલ  अशआर-શેર तसव्वुर-કલ્પના 
जुग्नू-આગિયા

9 June 2015

दूर तक तलाशमें मेरे साथ चल पड़े वो इंतजार है तुं ,मुकुल दवे "चातक"


दूर  तक  तलाशमें मेरे साथ चल पड़े वो इंतजार है तुं ,
हर  मोड़पे  जिंदगीमे  रहनुमां  बने  वो  राजदार है तुं ,

तेरे   पैगाममें  मंजरे-इश्कमें  धुआँ  हसरतका  मिला ,
कोई  अंजाम  न हो  वो  ही  आगाज  की  पुकार है  तुं ,

कोशिश   हरचंद   यह   रहेगी   न   उजड़ेगा   घोंसला ,
बने  जो  शाखसे  टूटने  न  दे  वो  रहमतगुजार  है तुं ,

मोहब्बतके   सिलसिला का  निशाँ  मिटने  नहीं  देंगे ,
बनाती   है  दिलमें  नक़्शे-कदम  वो  रह्गुजार  है  तुं ,

बेताबी  बढ़ाती  है  तेरी  साँसोकी  महक  जजबातोमे ,
जब गुजरती है खलिशें मिटाती हो वो खुशगवार है तुं ,

मुकुल दवे "चातक"

 हसरत-इच्छा// रह्गुजार-सहयात्री
राजदार-ह्रदय की बात जाननेवाला//मंजरे-दृश्य//
आगाज-शरुआत//रहमतगुजार-दयालु//
खलिशें-चुभन//खुशगवार-सुख देने वाली


3 June 2015

कश्मकश राजसे मेरे घर आये रियायत भी हो गई ,मुकुल दवे "चातक "


कश्मकश   राजसे  मेरे  घर  आये   रियायत  भी  हो  गई ,
सुरूर ऐसा  रुस्वा  भी  ना  हुआ  और  इशरत  भी हो  गई ,

उसने  करीब  आके   इस  कदर  नजरे-करम  मुझसे  की ,
तिश्नगीका  नशा भी  ना  हुआ  और  उल्फत  भी  हो गई ,

मत   पूछ   उसका   अंदाज   दर्द   देके   चारागर   बनना ,
तड़पना  तड़पाना  भी ना  हुआ और सियासत  भी हो गई ,

दीवानगी   की   इंतहा   का   मेरा   खुदा    कुछ   और   है ,
तलबसे  खफा  भी  ना  हुआ  और  इज्जत   भी   हो   गई ,

बेताब   भी   है   और   इश्क   का   दावा   भी   नहीं  करते ,
गिला  शिकवा  भी  ना  हुआ  और  इनायत  भी   हो   गई ,

जैसे  मजार  पे  माथों  का  टेकना  उस  तरह  मुझे   छूना ,
दिया मंदिरमें जलाना भी ना हुआ और इबादत भी हो गई

मुकुल दवे "चातक "
कश्मकश-द्विधा //रियायत-नरम व्यवहार// रुस्वा-बदनामी/
इशरत-आनंद//नजरे-करम-कृपा दृष्टि//तिश्नगी-प्यास//
चारागर-उपचारक//इंतहा-पराकाष्टा//इनायत-कृपा// इबादत-पूजा



28 May 2015

सफीना समन्दरमें नहीं डूबा किनारा न देख ,मुकुल दवे "चातक "


सफीना    समन्दरमें   डूबा    नहीं    किनारा    न    देख ,
जाके  सहरामें   डूबा   देख  तू , खुदको  बेसहारा न  देख,

यह    यकीनन   फितरत   है   रातकी   सूरज    लानेकी ,
सुबहकी    रोशनी    देख   तू ,  अँधेरा   दुबारा   न   देख ,

हर  नगर  भीड़  लगी  है  मरघट, मजार  और  बजारोमे ,
सिर्फ प्यास कम करके देख तू ,प्यासका फ़साना न देख ,

हर   राह्पे   हर   मोड़   पर   सवाल   बदलते   हुऐ   देखे ,
जवाबोकी   करवट  देख  तू ,  मोड़  पे  ठिकाना  न  देख ,

आग   उठी   है   कहाँसे   वो   तेरी   बसकी   बात    नहीं ,
गंगा  निकाली  जाऐ  देख  तू , धुआँका  आस्मां  न  देख ,

मुकुल दवे "चातक "
सफीना -नाव /फितरत -स्वभाव


24 May 2015

हर मोड़ पर अजनबी शख्स है ,इन्सान का क्या होगा ,मुकुल दवे "चातक"


हर मोड़ पर अजनबी  शख्स है ,इन्सान  का  क्या  होगा ,
वो   अपने  थे  जो  अन्जान बने ,एतबार का क्या  होगा ,

चंद    लम्होंके   लिए   शाखसे    पंछी    उडा    था    ही ! ,
हिस्सेमें  पेड़का वजूद रहा नहीं , मक़ाम  का  क्या होगा ,

अश्क    सिमटके   चहेरेकी   मुस्कानमें    ढल   रहे    हैं ,
जैसे शबनम हो  रोशन गुलपे , माह्ताब का  क्या  होगा ,

सुलगती   हर   शिकवा   खामोश   बन   के  रह  गई  हैं ,
जिगरमें  उभर  गई  खलिशें , अन्जाम  का  क्या  होगा ,

शम्माके   साथ   परिन्देके   सिलसिले   यूँ    ही  चलते ,
शम्मा   जलके   हुई   है  शोला , इजहार का  क्या होगा ,

मुकुल दवे "चातक"
 माह्ताब-चांद

19 May 2015

बेइतिन्हा उनकी महोब्बतममें डूबकर रह गया ,मुकुल दवे "चातक "


बेइतिन्हा   उनकी  महोब्बतमें  डूबकर  रह   गया ,
वक्तके  भँवरके  हाथोंमें  उनका  दामन  रह  गया ,

क्या   मायनेथे   रिश्तोके  आँखोमे  मै   रहता  था ,
वक्तकी   फितरतमें   बहकर   काजल   रह   गया ,

जख्म  उभरा ऐसाकी  उनकी  गली  तक  आ  गए ,
मसीहा लोग बने इन्तिहा का धुआँ बढ़कर रह गया ,

वक्त  ठहरा  नहीँ  किसीके  इन्तजारके  मोड़   पर ,
हर  मोड़पे  इश्क  दिवानगीमें आके बेबस रह गया ,

इश्ककी खुशबुका एहसास थोड़ा जाया कर दीजिये ,
इबादतसे  गुजरे  मेरे  घरसे उनका असर  रह गया ,

मुकुल दवे "चातक "
इन्तिहा-पराकाष्ठा // फितरत-स्वभाव





5 May 2015

आईना आदमीका अक्स देखकर बदलासा क्यों है ,मुकुल दवे "चातक"


आईना  आदमीका अकस   देखकर  बदलासा  क्यों  है ,
आदमी आदमी  के  साथ  है  फिरभी तन्हासा  क्यों  है ,

जिक्र  उनका  निकला  फिर  छाई  उदासी  महेफिलमें ,
अर्सा हुआ जख्म भरे , निशान  दर्दका जरासा  क्यों  है ,

डूबकर आँखों में  कागजकी कस्तीमें सफर कर  रहे  है ,
झील  जैसी  आँखोंमें   पानी  ठहरा  ठहरासा   क्यों   है ,

अधूरा अफ़साना  है  मगर  मायूस  भी  करती  नहीं  है ,
फिरभी चेहरे पे बिखरी लट के पीछे हैरॉ हैरॉसा क्यों  है ,

दुनियासे  क्या  शिकायतें , गिला  लोगोसे    क्या  करे ,
करनी   है   तुम्हें   ऊँची    दीवारे   दरवाजासा  क्यों  है ,

मुकुल दवे "चातक" अकस-प्रतिबिंब