24 May 2015

हर मोड़ पर अजनबी शख्स है ,इन्सान का क्या होगा ,मुकुल दवे "चातक"


हर मोड़ पर अजनबी  शख्स है ,इन्सान  का  क्या  होगा ,
वो   अपने  थे  जो  अन्जान बने ,एतबार का क्या  होगा ,

चंद    लम्होंके   लिए   शाखसे    पंछी    उडा    था    ही ! ,
हिस्सेमें  पेड़का वजूद रहा नहीं , मक़ाम  का  क्या होगा ,

अश्क    सिमटके   चहेरेकी   मुस्कानमें    ढल   रहे    हैं ,
जैसे शबनम हो  रोशन गुलपे , माह्ताब का  क्या  होगा ,

सुलगती   हर   शिकवा   खामोश   बन   के  रह  गई  हैं ,
जिगरमें  उभर  गई  खलिशें , अन्जाम  का  क्या  होगा ,

शम्माके   साथ   परिन्देके   सिलसिले   यूँ    ही  चलते ,
शम्मा   जलके   हुई   है  शोला , इजहार का  क्या होगा ,

मुकुल दवे "चातक"
 माह्ताब-चांद

19 May 2015

बेइतिन्हा उनकी महोब्बतममें डूबकर रह गया ,मुकुल दवे "चातक "


बेइतिन्हा   उनकी  महोब्बतमें  डूबकर  रह   गया ,
वक्तके  भँवरके  हाथोंमें  उनका  दामन  रह  गया ,

क्या   मायनेथे   रिश्तोके  आँखोमे  मै   रहता  था ,
वक्तकी   फितरतमें   बहकर   काजल   रह   गया ,

जख्म  उभरा ऐसाकी  उनकी  गली  तक  आ  गए ,
मसीहा लोग बने इन्तिहा का धुआँ बढ़कर रह गया ,

वक्त  ठहरा  नहीँ  किसीके  इन्तजारके  मोड़   पर ,
हर  मोड़पे  इश्क  दिवानगीमें आके बेबस रह गया ,

इश्ककी खुशबुका एहसास थोड़ा जाया कर दीजिये ,
इबादतसे  गुजरे  मेरे  घरसे उनका असर  रह गया ,

मुकुल दवे "चातक "
इन्तिहा-पराकाष्ठा // फितरत-स्वभाव





5 May 2015

आईना आदमीका अक्स देखकर बदलासा क्यों है ,मुकुल दवे "चातक"


आईना  आदमीका अकस   देखकर  बदलासा  क्यों  है ,
आदमी आदमी  के  साथ  है  फिरभी तन्हासा  क्यों  है ,

जिक्र  उनका  निकला  फिर  छाई  उदासी  महेफिलमें ,
अर्सा हुआ जख्म भरे , निशान  दर्दका जरासा  क्यों  है ,

डूबकर आँखों में  कागजकी कस्तीमें सफर कर  रहे  है ,
झील  जैसी  आँखोंमें   पानी  ठहरा  ठहरासा   क्यों   है ,

अधूरा अफ़साना  है  मगर  मायूस  भी  करती  नहीं  है ,
फिरभी चेहरे पे बिखरी लट के पीछे हैरॉ हैरॉसा क्यों  है ,

दुनियासे  क्या  शिकायतें , गिला  लोगोसे    क्या  करे ,
करनी   है   तुम्हें   ऊँची    दीवारे   दरवाजासा  क्यों  है ,

मुकुल दवे "चातक" अकस-प्रतिबिंब

29 April 2015

मैं तेरे मैखानामे आया होता ,जाम पीलानेका दौर कुछ ओर होता ,मुकुल दवे "चातक'


मैं  तेरे  मैखानामें  आया होता ,जाम पीलानेका  दौर कुछ  ओर  होता ,
तु  पीलाता  मैं पीता तेरे  हसीन नजारे चुरानेका  दौर कुछ ओर  होता ,

नकाब   चहेरेसे   तु    उतार  दे ,  ऐतबारकी  दिवार   हिलने  लगी   है ,
प्यार ही ऐतबारकी  बुनियाद  है ,उन्हें हिलानेका दौर कुछ ओर  होता ,

शब    हो    या    सहर ,   शमाए    बुजाने    से    कोई    फायदा   नहीं
परवाने जलके खाक हो गये  मुहब्बत निभानेका  दौर कुछ ओर होता ,

बहुत    कड़ा    है    सफर    अपने    रहनुमाको    साथ    लेके    चलो ,
नशेमें  हूँ  मैं  होश  नहीं  तुम्हे  रंजिशें जतानेका  दौर कुछ  ओर होता ,

भाग  किधर  रहा  है तू  नंगे शहरमे जबाँ  बेचनी होगी तुम्हें जमीरभी ,
हर  रोज तिश्नगी होगी यहाँ तक़दीर आजमानेका दौर कुछ ओर होता

मुकुल दवे "चातक'
शब-रात /  रहनुमा-मार्गदर्शक / तिश्नगी-प्यास

24 April 2015

पल भरके लिए लगा की कोई अपना पुकारता हुआ होगा ,मुकुल दवे "चातक"


पल  भरके  लिए लगा  की  कोई  अपना  पुकारता हुआ  होगा ,
मगर   वो   अपना   नहीँ   था ,  आपको   धोखा   हुआ   होगा ,

सजा    मिली    है    मेरे   गुनाहसे   बढ़कर   वो   अहसास   है ,
मशहूर   खुदको   करने   मुझे  बाजारमें  उछाला  हुआ   होगा ,

इस    तालाबका   पानी   बदल   दो    वकत   बदल   गया   है ,
वो  मछलियाँको   किटियों ने चारा  बनाकर  खाया हुआ होगा

निकली  चीख  तो  उनके  घरकी  दहलीज  तक   ठहरी  होगी ,
शहर की  भीड़ भाड़  के  शोरसे  वो  खुदको  ढूँढता  हुआ  होगा ,

शमा पे परिन्दे जलनेसे रोशनीके उजाले कम नहीँ हुआ करते ,
शहरमें  मशाले  जली  हुई  है  बेवफाइका  हादसा   हुआ  होगा ,

भूख  से  सब्र  कर   धनी थरथरा ने से रोटियाँ  उछाल रहा   है ,
भूखेके  हाथमें  मशाल  है  धनी  ने  हंगामा  देखा   हुआ  होगा ,

मुकुल दवे "चातक"

13 April 2015

अश्कके सैलाबमें जज्बातकी डूबी कश्तीको किनारे लायेंगें,मुकुल दवे "चातक"


अश्कके  सैलाबमें  जज्बातकी डूबी कश्तीको किनारे लायेंगें,
आँखोंमें   फिरसे   जिंदगीमें  हसीन  ख़्वाब  हमारे  सजायेंगें,

तेरे   हाथोंकी   लक़ीरोंमे   मेरा   नाम   हो   वो   जरूरी  नहीं ,
मेरा   प्यार   खुदाकी   लक़ीरोंसे  तुम  तक मोड़ सारे लायेंगें,

सिनेमें   जलन   आँखोंमें  नमी   जब   तलक   जली  हुई  है ,
तेरे   सिनेमे   लुटे   ख़्वाबके   गमका   बोझ उतारे   जायेंगें,

युँ मत रख दर्दे जिगर आखिर अलविदाका सफर नहीं  होगा ,
कारवाँमें चहेरे होगें दिलसे तेरे चहेरेके  नहीं नजारे मिंटायेंगें,

युँ  पकड़  ले  हाथ  मेरा  बहुत  भीड़  लगी है जमानेके मेलेमें ,
जख्मके    मरहम   बनेगे   तेरी   सीरतमेँ    बहारे   नवाजेंगें,

एक   निगाहे   करमसे   हमने   तुम्हारी  कायनात   पाई   है ,
बस यु  छेड़ते रहो हसीन दिलके  तार  हम  मलहारे सुनायेंगें,


मुकुल दवे "चातक"
 सीरत-सौजन्य






8 April 2015

मरा नहीं वो जलाया गया खुदापे इल्जाम बताया जा रहा है ,मुकुल द्वे "चातक"


मरा  नहीं  वो जलाया गया खुदापे  इल्जाम बताया  जा  रहा  है ,
जिस्मका   बेखबर  धूंआ का   अंजाम    बताया   जा   रहा     है ,      

भूंखी   नंगी   बस्तीके  आँगनमे   कभी   चूल्हे   जलते  नहीं  है ,
उनकी आहट,आस,तमन्ना आँसु  इन्तिक़ाम बताया जा  रहा है ,

तबाही   की    चीख    कभी    बेजबान    जहानमें    नहीं  होगी ,
जख्म जमीं  खामोश  है वह  गवाह  पयगाम बताया जा  रहा है ,

शोरसा    उठा    है    जहनमे    लब     बेबसीमें   सी    लिए    है ,
तमाशा  जुल्मका  बढ़ा  है  उनको  मकाम  बताया  जा  रहा   है ,

सितमगरकी     साज़िशें    बस  युँ  ही     बुलंद     हो    गई    है ,
आदमीको     भटका    हुआ     गुलाम    बताया    जा    रहा   है ,

मुकुल द्वे "चातक"
इल्जाम-तोहमत // इन्तिक़ाम-प्रतिशोध //पयगाम-संदेश